''चौका
चार जनें चौका की चरचा चौक में कत्ते चाव में,
चौंकत्ते कोउ कै नर्इ लैबे भइया अपने गाँव में।
चौका जिते चार 'क के रए कबें खाव का? कितनौ?
काए खाव? उर कैसे खइयो? सुनो सबद हों इतनौ।।
भूख लगें जब खाव!अजीरन होंय न खइयौ उतनौ।
हौलें-हौले चबा के खइयों तन मन संवरै जितनौ।।
चौक चकाचक चौक रत्ते चारइ खंूट दिखाव में।
चौकत्ते कोउ कै नइं लैबे भइया अपने गाँव में।।
सोंदी सी सुगंद चौका की रस-रस रिसत रसोर्इ में।
होम लगत,परसत,मन हरसत झरत रसोर्इ में।।
षटरस व्यंजन बनत रसोर्इ चाओ चबा के खालो पीलो।
चटनी चाटत जाव चाव से चौंख चौख फल जी भर जी लो।।
हाले फूले रत्ते कत्ते 'मधुप है संगे खाव में।।
पं.बाबूलाल द्विवेदी 'मानस मधुप
छिल्ला, ललितपुर (उ.प्र.)
चार जनें चौका की चरचा चौक में कत्ते चाव में,
चौंकत्ते कोउ कै नर्इ लैबे भइया अपने गाँव में।
चौका जिते चार 'क के रए कबें खाव का? कितनौ?
काए खाव? उर कैसे खइयो? सुनो सबद हों इतनौ।।
भूख लगें जब खाव!अजीरन होंय न खइयौ उतनौ।
हौलें-हौले चबा के खइयों तन मन संवरै जितनौ।।
चौक चकाचक चौक रत्ते चारइ खंूट दिखाव में।
चौकत्ते कोउ कै नइं लैबे भइया अपने गाँव में।।
सोंदी सी सुगंद चौका की रस-रस रिसत रसोर्इ में।
होम लगत,परसत,मन हरसत झरत रसोर्इ में।।
षटरस व्यंजन बनत रसोर्इ चाओ चबा के खालो पीलो।
चटनी चाटत जाव चाव से चौंख चौख फल जी भर जी लो।।
हाले फूले रत्ते कत्ते 'मधुप है संगे खाव में।।
पं.बाबूलाल द्विवेदी 'मानस मधुप
छिल्ला, ललितपुर (उ.प्र.)
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